सामग्री पर पहुँचे | Skip to navigation

Personal tools
आप यहाँ हैं घर cyber laws आईटी ऍक्‍ट ऑफ इंडिया 2000

Large Text  small text  original text  text mode site  

आईटी ऍक्‍ट ऑफ इंडिया 2000

Last Updated on: Apr 08, 2010 12:57 PM

आईटी ऍक्‍ट ऑफ इंडिया 2000

मई 2000 में, दोनों भारतीय संसद के गृहों ने सूचना प्रौद्योगिकी विधेयक को पारित कर दिया। इस विधेयक ने अगस्त 2000 में राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त की और इसे सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के रूप में जाना गया। आईटी अधिनियम 2000 में साइबर कानून समाविष्‍ट हैं।
यह अधिनियम का लक्ष्‍य भारत में ई-वाणिज्य के लिए कानूनी बुनियादी ढांचा उपलब्ध करना है। और साइबर कानून का भारत में ई-व्यवसायों और नई अर्थव्यवस्था बड़ा प्रभाव पडता है। इसलिए, आईटी अधिनियम 2000 के विभिन्न दृष्टिकोणों को समझना और यह क्या प्रसतुत कर रहे हैं समझना महत्वपूर्ण है।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 का लक्ष्‍य भी कानूनी ढांचा उपलब्‍ध कराना है जिस से कि कानूनी पवित्रता सभी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और अन्य गतिविधियों को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्रदान करने के लिए अनुरूप हो सके। अधिनियम कहता है कि जब तक अन्यथा सहमति नहीं प्रकट की जाए कि अनुबंध की स्वीकृति इलेक्ट्रॉनिक संचार के साधनों और कानूनी वैधता और लागूकरण द्वारा होगी। इस अधिनियम के कुछ महत्‍वपूर्ण बिंदु नीचे सूचीबद्ध हैं:

अधिनियम का द्वितीय अध्याय की विशेष रूप से कहता है कि कोई भी ग्राहक अपने डिजिटल हस्ताक्षर जोड कर एक इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड प्रमाणित कर सकता है। यह आगे कहता है कि कोई भी व्यक्ति ग्राहक की सार्वजनिक कुंजी के प्रयोग से एक इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को सत्यापित कर सकते हैं।

अधिनियम का तृतीय अध्याय इलेक्ट्रॉनिक शासन के बारे में और अन्‍य परस्‍पर के बीच में जहाँ कोई कानून है कि जानकारी या कोई अन्य विषय लिखित स्‍वरूप में होगा या टाइप किया या छपी  हुई सामग्री, तो ऐसे कानून को न मानते हुए, ऐसी आवश्यकता को संतुष्ट करने के लिए यदि यह सूचना या जानकारी है तो --

एक इलेक्ट्रॉनिक रूप में उपलब्ध कराया या दिया गया है; और बाद में संदर्भ के लिए उपयोगी करने के लिए सुलभ।

उल्‍लेखित अध्याय डिजिटल हस्ताक्षर की कानूनी मान्यता का विवरण देता है।
 
अधिनियम का चतुर्थ अध्याय विनियमन के प्रमाण पत्र अधिकारियों को प्रमाण पत्र के लिए एक योजना देता है। यह अधिनियम प्रमाणपत्र प्राधिकरणों के नियंत्रक की परिकल्पना पूर्ण करता है, जो अधिकारियों की गतिविधियों पर निगरानी रखने का काम करेगा क्‍योंकि प्रमाणपत्र प्राधिकरणों पर शासन करनेवाले मानक और शर्तों को भी विभिन्न रूपों और डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाणपत्र की सामग्री के रूप में निर्दिष्ट प्राधिकारी का प्रमाण पत्र प्रदर्शित करेगा। अधिनियम विदेशी अधिकारियों को पहचानने की आवश्यकता को मान्यता देता है और आगे विविध उपलब्‍धताओं के बारे में विवरण देता है, लाइसेंस प्राप्‍त करने के लिये प्रावधानों के मुद्दे जारी करते हुए डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र की अधिक जानकारी देता है।
अधिनियम का षष्‍ठम अध्याय डिजिटल हस्ताक्षर प्रमाण पत्र से संबंधित बातों की इस योजना के विवरण देता है। उपभोक्ताओं के कर्तव्‍य/शुल्‍क भी इस अधिनियम में निहित हैं।

अधिनियम का नवम अध्याय पेनल्टीज़/दंड/जुर्माना और विभिन्न अपराधों के लिए अधिनिर्णयन कानून के बारे में विवरण देता है। प्रभावित व्यक्तियों के कंप्यूटर को, कम्प्यूटर प्रणाली आदि के नुकसान के रूप में क्षतिपूर्ति के रूप में 1 करोड रुपये से अधिक दंड नहीं तय किया गया है। अधिनियम एक निर्णायक अधिकारी की नियुक्ति के बारे में कहता है जिसमें वह अधिकारी किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी भी प्रावधानों का उल्लंघन किया गया है इसका निर्णय करेगा। यह अधिकारी भारत सरकार या राज्य सरकार का समकक्ष अधिकारी होगा जो एक निदेशक के रैंक से नीचे नहीं होगा। इस निर्णायक अधिकारी को एक नागरिक न्यायालय का अधिकार दिया गया है।

अधिनियम का दशम अध्याय सायबर रेग्‍लुलेशन्‍स अपीलेट ट्रिब्यूनल की स्थापना के बारे में विवरण देता है, जिसमें अपील निर्णायक अधिकारियों द्वारा पारित आदेश के विरूध्‍द अपील करना पसंद किया जाएगा।

अधिनियम का ग्‍यारहवाँ अध्याय विभिन्न अपराधों के बारे में विवरण देता है और अपराधों की जाँच एक पुलिस अधिकारी जो उप पुलिस अधीक्षक के पद नहीं नीचे होगा, उसी के द्वारा की जाएगी। इन अपराधों में कंप्यूटर स्रोत दस्तावेजों के साथ हस्‍तक्षेप की जानकारी, जो इलेक्ट्रॉनिक स्‍वरूप में अश्लील प्रकाशन, और हैकिंग का समावेश है।

यह अधिनियम साइबर विनियम सलाहकार समिति के गठन के लिये भी उपलब्‍ध है, जो सरकार को किसी भी नियम से संबंधित या अधिनियम संबंधी किसी अन्य उद्देश्य के साथ जुड़ने की सलाह देता है। इस अधिनियम में भारतीय दंड संहिता 1860, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872, द बैंकर्स बुक साक्ष्य अधिनियम, 1891, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट, 1934 को अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप बनाने के लिए उनमें संशोधन करने का प्रस्ताव है।
3.25
No rating set
Document Actions
Share |

feedback feedback validator